बुधवार, 28 अप्रैल 2010

प्रणय के क्षण

दिये प्रणय के जो क्षण तुमने,
जीवन के आधार बन गए ,
घृणा, उपेक्षा, पीड़ा, दंशन
परित्यक्ता को प्यार बन गये !

सुख सज्जा के स्वप्न ह्रदय ने
मिलन रात्रि में खूब सँवारे ,
हुई विरह की भोर, नयन के
मोती ही गलहार बन गये !

कभी निशा की शीतलता का
मोल न कर पाया था जो मन ,
उसके लिये गगन के तारे
झुलसाते अंगार बन गये !

जिन सौरभयुत सुमनों को चुन
कभी सजाई सेज पिया की ,
दुर्दिन की छाया पड़ते ही
वे ही तीखे खार बन गये !

अरमानों के विहग लुटे से
त्याग रहे प्राणों की ममता ,
खुले द्वार थे जिस मंदिर के
वे अब कारागार बन गये !

कैसे वे दिन रातें भूलूँ ,
कैसे भूलूँ उनकी बातें ,
सुख सरिता के मंद झकोरे
अरे उफनते ज्वार बन गये !

किरण