मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

मुझे मिले वे चरण

प्राण तरसते रहे निरंतर, मिला किसी का प्यार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !

मंजिल दूर, डगर अनजानी, जीवन पथिक थका हारा,
एकाकी सर्वस्व लुटा कर फिरता है मारा-मारा,
निज अभीष्ट मंदिर का जिसने पाया अब तक द्वार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !

अनदेखे सपनों में खोई आशा की दुलहिन भोली,
अनब्याही ही रही, उठी है कब उसके घर से डोली,
छल-छल छलके नयन, मिला पीड़ा को कुछ आधार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !

विश्वासों के दीपक कब तक बिना स्नेह जलते जाएँ,
बेड़ी पड़ी पगों में कैसे फिर बंदी चलते जाएँ,
अगम सिंधु, पंकिल तट, टूटी नौका है, पतवार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !

निठुर देवता छल कर मेरा जीवन क्या तुमने पाया,
मेरा निश्च्छल ह्रदय सुमन क्यों निष्ठुर बन कर ठुकराया,
बाल विहग भावों के निर्बल कर सकते प्रतिकार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !

किरण