शनिवार, 10 अप्रैल 2010

जीत क्या है हार क्या है

जो किसी भी मूल्य पर
बीते दिवस लौटा सकी तो,
मैं तुम्हें बतला सकूँगी
जीत क्या है हार क्या है !

था बड़ा जीवन सुनहरा,
मस्त, चिंता का न कुहरा ,
छू सका था जिसे केवल
खेलना, खिलना, मचलना !
जो यदि वह पा सकी तो
मैं तुम्हें बतला सकूँगी
अश्रु का संसार क्या है !

एक था साथी ह्रदय का
मीत मेरे निज पलों का,
खो चुकी हूँ आज उसको
तुच्छ जिससे स्वर्ण भी था !
फिर उसे यदि खोज पाई
तो तुम्हें बतला सकूँगी
नयन का अभिसार क्या है !

वह मधुर मधुमास जिसमें
फूल, सौरभ, फाग जिसमें,
कोकिला के एक स्वर से
गूँज उठते राग जिसमें !
आ गया फिर भूल कर यदि
तो तुम्हीं कहने लगोगे
सृष्टि का श्रृंगार क्या है !

किरण