शनिवार, 3 अप्रैल 2010

अरे कौन तुम !

अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !

मैंने जीवन के प्रभात में विस्मृति की झाँकी देखी है ,
आश लता पर कान्त कल्पना की तितली बाँकी देखी है ,
मैंने देखा अरमानों को चहक-चहक मधुरिम स्वर करते ,
मैंने देखा अभिलाषा के सागर से तृष्णा घट भरते ,
किन्तु अरे तुम कौन राह में मेरी रोड़े अटकाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !

तुम आये मेरे जीवन ने कसक वधू का कर पकड़ा है ,
तुम आये मेरे मानस को मोह व्याधि ने आ जकड़ा है ,
तुमने आ मेरे अंतर में विप्लव की ज्वाला सुलगा दी ,
शान्ति सुधा से भरे कटोरों में अशांति की सुरा मिला दी ,
सावन घन बन कर नयनों में कौन अरे तुम आ छाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !

अब मैंने देखा रोटी के टुकड़ों पर लड़ने वालों को ,
क्षणभंगुर वैभव पर तिल-तिल प्राण भेंट करने वालों को ,
देखी है अतृप्ति की झंझा, देखा है आहों का नर्तन ,
देखा संसृति रंगमंच पर मृत्यु कामिनी का आवर्तन ,
सम्वेदन की मृदु वीणा पर कौन अरे तुम गा जाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !

क्षण-क्षण बढ़ता इस विनाश पथ पर यह रथ निर्माणों का है ‘
हाट लग रही प्राणी मात्र की, मोल हो रहा प्राणों का है ,
जहाँ माँगती है दरिद्रता लक्ष्मी से स्वाँसों का लेखा ,
आज अचानक वहीं दीखती बदली सी नियति की रेखा ,
महा प्रलय के इस ताण्डव में क्यों तुम मुझको भा जाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !

किरण