सोमवार, 12 अप्रैल 2010

प्यार का अधिकार

मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !
और जीने को न तुमसे स्नेह का आधार लूँगी !
मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !

पंथ मेरा गगन के जल कण सजल करते रहेंगे,
चन्द्र की अवहेलना सह ज्योति कण झरते रहेंगे,
दीप भी बुझ जायें नभ के, है न इनकी चाह मुझको,
तम मुझे प्रिय, मैं न तुमसे दया का आधार लूँगी !

मैं न तुमसे प्यार का आधिकार लूँगी !

जा बसूँगी मैं वहाँ मिट्टी जहाँ सूखी पड़ी हो,
झर गये हों पेड़ के पत्ते, न बेलें ही चढ़ी हों,
हो न कोकिल और बुलबुल, शून्य हो वन का कलेवर,
पर न मैं तुमसे सजलता, तृप्ति और बहार लूँगी !

मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !

टूट जाये बीन चाहे, साज़ सब सूने पड़े हों,
कंठ स्वर हों भग्न, भावांकुर भले उजड़े पड़े हों,
क्षितिज तक भी स्वर न पहुँचें और प्रतिध्वनि डूब जाये,
पर न मैं स्वर, साधना या बीन की झंकार लूँगी !

मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !

मैं अकेली ही भली, प्रियतम मुझे मत दो सहारा,
नियति का बन्धन सुदृढ़ मत खोलना फिर से दुबारा,
तुम न आओ, मत सृजन सुख का करो मेरे लिये कुछ,
याद अपनी फेर लो बस, मैं यही उपहार लूँगी !

मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !

किरण