रविवार, 4 अप्रैल 2010

परदेशी निर्मोही !

वह पंथी तो परदेशी है ,
कर पल्लव हिला-हिला उसको
क्यों व्यर्थ बुलाते हो पादप ,
क्यों स्नेह जताते हो पादप !

क्या जाने उसका कौन नगर ,
क्या जाने उसकी कौन डगर ,
क्या जाने कहाँ लुटायेगा
वह स्नेह सुधा प्याले भर-भर !
निर्मम होते हैं परदेशी
जग तो यह ही कहता आया
क्यों इसे भूलते हो पादप ,
क्यों नेह लुटाते हो पादप !

तेरी छाया में आ क्षण भर
मेटा श्रम, उर भर तृप्ति अमर ,
वह आज न जाने कहाँ पहुँच
फिर अपना नया बनाये घर !
झिलमिल स्वप्नों की संसृति में
तुम याद न आओगे उसको ,
क्यों समय गँवाते हो पादप ,
क्यों प्यार लुटाते हो पादप !

रोते तो कितने ही आते ,
क्षण भर रुक मौज मना जाते ,
जोड़ोगे कब तक किस-किस से
ऐसे रिश्ते ऐसे नाते !
यह दुनिया है आनी जानी
रुक सका न कोई चिरजीवन
क्यों मोह बढ़ाते हो पादप ,
क्यों प्रीत लुटाते हो पादप !

किरण