रविवार, 25 अप्रैल 2010

अनुभूति

सोच रहा मेरा पागल मन !
कौन शक्ति दुनिया में
जिससे है इतना भारी अपनापन !
सोच रहा मेरा पागल मन !

है सुख क्या दुःख कौन वस्तु है,
है अथवा यह सब केवल भ्रम,
क्या इस जीवन में सुख दुःख का
चलता ही रहता है यह क्रम,
क्यों नैराश्य है दुःख का सूचक,
क्यों है आशा ही में जीवन !
सोच रहा मेरा पागल मन !

अपने ही जीवन पर अपना
क्यों रहता अधिपत्य नहीं है,
मृत्यु बता जाती जो आकर
कुछ तेरा अस्तित्व नहीं है
है जीवन का सार अरे क्या
बस केवल चिंता औ चिंतन !
सोच रहा मेरा पागल मन !

पीड़ाओं का सागर है या
है अवसादों का साम्राज्य,
है क्या यह संसार चक्र जो
नहीं समझ में आता आज,
मृगतृष्णा सी इस माया में
फँस कर भटक रहा चंचल मन !
सोच रहा मेरा पागल मन !

किरण