मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

चाँद और लहर

जब लहर ने उठा शीश ऊपर लखा
चाँद ने मुस्कुरा कर निगाह फेर ली !

ऊब कर शून्यता से गगन की बहुत
एक दिन चाँदनी आ सरित से मिली ,
हर लहर में निरख ज्योति के पुंज को
एक प्रतिबिम्ब पाकर बहुत वह खिली !

वीचि के गान में भूल अपनत्व को
उन तरंगों में जा कर स्वयं खो गयी ,
ताल पर हर लहर की लगी नाचने
वह भँवर की सुशैया में जा सो गयी !

स्वप्न देखा अचानक उठी चौंक कर
चाँद तो रूठ कर के कहीं खो गया ,
किन्तु प्रतिबिम्ब लहरों में उसका निरख
क्या जाने अरे ज्योति को हो गया !

क्रोध से उर लगा काँपने उस घड़ी
श्याम मुख हो गया, द्वेष से भर गयी ,
चल पड़ी चंद्रिका लाल मुखड़ा किये
चक्षु से मोतियों की झड़ी लग गयी !

सत्य का अंश भी खोज पाई कहाँ
ईर्ष्या की निशा ने उसे घेर ली ,
जब लहर ने उठा शीश ऊपर लखा
चाँद ने मुस्कुरा कर निगाह फेर ली !

किरण