सोमवार, 19 अप्रैल 2010

नाविक से

ले चल मेरी नौका पार !

भव सागर में बही जा रही,
नहीं किनारा कोई पा रही,
सुख दुःख की झंझा में पड़ कर
डूब रही मंझधार !
ले चल मेरी नौका पार !

नाविक मुझे वही तट भाये,
रहें जहाँ जग से ठुकराये,
जहाँ बसा हो एक अनोखा
पीड़ा का संसार !
ले चल मेरी नौका पार !

मैं भी उनमें घुलमिल जाऊँ,
उनके दुःख में दुःख बिसराऊँ,
सुखी जनों की कर अवहेला
करूँ दुखों को प्यार !
ले चल मेरी नौका पार !

अब नौका ले चलो वहाँ पर,
दुःख सागर तट मिलें जहाँ पर,
जिसके हर एक कण में गूँजे
करुणा की झंकार !
ले चल मेरी नौका पार !

आशा नागिन डस ना पाये,
निशा निराशा की हँस जाये,
अमा दिवा के शांत प्रहर में
जीवन का अभिसार !
ले चल मेरी नौका पार !

किरण