सोमवार, 29 मार्च 2010

मनोव्यथा

मन चलो एकांत में
सुख शान्ति से जीवन बिताने,
दु:ख कुछ जग का भुलाने,
आग कुछ उर की बुझाने !

हँस रहा जग देख तुझको
रुक न पल भर भी दिवाने,
बस चला चल राह अपनी
इक नयी दुनिया बसाने !

शून्य में चल गगन को
कुछ दु:खमयी ताने सुनाने,
व्यंग से कुचले ह्रदय के
भाव कुछ उसको दिखाने !

छोड़ दे ये मित्र सारे
हो चुके जो अब बेगाने,
शून्य से कर मित्रता
नैराश्य को आशा बनाने !

भार तू जग को अरे
अब रह न यों उसको दुखाने,
छोड़ मिथ्या मोह को रे
तोड़ दे बंधन पुराने !

क्षितिज के उस पार जा छिप
बैठ कर आँसू बहा ले,
निठुर जग की ज्वाल से रे
यह दुखी जीवन बचा ले !

किरण