शनिवार, 13 मार्च 2010

अंत और अनंत

जीवन के मृदु क्षण मैं साथी
कैसे जाऊँ भूल !
तुम अनंत मैं अंत
चिरंतन है यह सुन्दर मेल ,
एक दूसरे पर अवलम्बित
है जीवन का खेल !
काटूँगी वियोग की घड़ियाँ
स्मृति झूला झूल !
जीवन के मृदु क्षण मैं साथी
कैसे जाऊँ भूल !

दो दिन को आता पतझड़ में
मंजुल मधुर वसंत,
कलियाँ खिल-खिल सुरभित करतीं
नित प्रति दिशा दिगंत !
कसक हृदय में सहसा
पड़ते तब ‘मृदु क्षण’ बन शूल !
जीवन के मृदु क्षण मैं साथी
कैसे जाऊँ भूल !

मोह न है कुछ इस जीवन का
और न ही कुछ लोभ,
ढूँढ रहा है पथ, यह पागल
प्राण ह्र्दय भर क्षोभ !
जहाँ शांति सागर बहता है
सुखमय जिसका कूल !
जीवन के मृदु क्षण मैं साथी
कैसे जाऊँ भूल !

किरण