गुरुवार, 11 मार्च 2010

विश्व देव वंदन

'उन्मना' का यह प्रथम पुष्प प्रिय पाठकों को समर्पित है ! 'उन्मना' में सभी रचनायें मेरी माँ श्रीमती ज्ञानवती सक्सैना 'किरण' द्वारा रचित हैं ! इन्हें आप तक पहुँचाने का मेरा यह विनम्र प्रयास है !

जो विश्व देव मैं तुम्हें रिझाने पाऊँ ,
जो जगतपते मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

तो ताल तरंगिणि से जल कण चुन-चुन कर
अपने नयनों की घटिकाओं में भर कर
ओ विष्णु देव तव चरण धुलाने आऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

बोझिल बादल की मैं गरिमा ले आऊँ
सूने अंतर के अम्बर में भर लाऊँ
ओ विश्वम्भर जी भर तुझको नहलाऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

सुरभित कुसुमों का मैं पराग ले आऊँ
कोमल कलिका की मैं सुवास भर लाऊँ
तेरे मन्दिर के प्रांगण में बिखराऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

मैं हरिताम्बर ले आऊँ प्रकृति नटी का
दूँ बाल चन्द्र का मस्तक पर शुभ टीका
तेरी प्रतिमा को नित्य नवीन सजाऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

लाऊँ चुन-चुन कर मधुर फलों की डाली
तेरे भोजन को जग उपवन के माली
मैं भुवन भास्कर का दीपक ले आऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

अपने गीतों में भर कोकिल का मृदु स्वर
मैं नित्य सुनाऊँ राग रागिनी गाकर
हा देव ! किंतु मैं शक्ति कहाँ से पाऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

मैं तुच्छ मनुज तुम हो महान जगदीश्वर
कैसे चरणों की धूल चढ़े मस्तक पर
केवल आकुल उर अंतर तुम्हें दिखाऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें जगाने पाऊँ !

लाऊँ भर झोली अश्रुहार दुखियों के
व्याकुल आहें, करुणोदगार दुखियों के
दे दो साहस ऐ देव भेंट कर जाऊँ !
जो विश्व देव मैं तुम्हें रिझाने पाऊँ !

किरण