गुरुवार, 25 मार्च 2010

विरहिणी

प्राण न क्या तुम तक पहुँचेगी
व्याकुल उर की करूण पुकार,
और न क्या मैं फिर पाउंगी
अपना लुटा हुआ संसार ?

प्रात पवन ऊषा के आँचल से
आती कुछ ले संदेश ,
और कल्पना पगली चल पड़ती
अपने प्रियतम के देश !

किन्तु भटक कर स्वयम्
भावना में खो जाती है पगली ,
और ह्रदय में छा जाती है
घोर निराशा की बदली !

सांध्य सुन्दरी लाज भरी
कह जाती कानों में आकर ,
उठ तेरे वे प्रियतम आये
जिन्हें बुलाती गानों में !

चौंक देखती किन्तु न कोई
आता, यह था केवल भ्रम ,
कैसे आज लौट आयेंगे
मेरे परदेसी प्रियतम !

मै बन करके श्याम घटा
प्रिय चंद्र छिपा लूँ अपने में ,
भाग्य तारिका चमक पड़े
यदि दर्शन पाऊँ सपने में !

किन्तु असंभव है यह मुझको
स्वप्न स्वप्न बन जाएगा ,
मेरे रूठे जीवनधन को
कौन मना कर लायेगा !

मुझे दीखता पंथ एक ही
प्रियतम तुम्हें भुला दूँ मैं ,
तेरी स्मृति की वेदी पर
अपनी भेंट चढ़ा दूँ मैं !

जीवन की पगडंडी तेरी
कुसुमों से कोमलतर हो ,
बिछें राह में कंटक मेरे
पैर बढ़ाना दुस्तर हो !

दीपमालिका जगमग जगमग
तेरे प्रांगण में चमकें ,
पीड़ा की ज्वाला में मेरा
जला हुआ यह उर दमके !

लुटी भावना की बस्ती में
यह चिनगारी चमक पड़े ,
भस्मसात अरमानों पर
झर-झर कर आँसू बरस पड़े !


किरण