रविवार, 30 मई 2010

रीते आँगन का सूनापन

रीते आँगन का सूनापन
भर जाता दसों दिशाओं में,
विगलित हो जाता है कण-कण !
रीते आँगन का सूनापन !

नव पल्लव आच्छादित पीपल
रक्तिम तन सिसकी सी भरता,
सूने कोटर के पास बया
चंचल हो परिक्रमा करता,
उसके नन्हे-मुन्नों के स्वर
ना उसे सुनाई देते हैं,
पीपल की नंगी बाहों पर
नि:संग उसाँसें लेते हैं,
उनके अंतर की व्यथा कथा
नि:स्वर भर जाती अंतर्मन !
रीते आँगन का सूनापन !

क्षण भर को कोकिल आ करके
उनको आश्वासन दे जाती,
तोतों, मोरों, चिड़ियों की धुन
भी पीर न मन की हर पाती,
बढ़ जाती और वेदना ही
नयनों में सावन की रिमझिम,
स्वांसों में दुःख की शहनाई
बज उठती है हर पल हर क्षण,
इन सबमें सुख की क्षीण किरण
पा लेता मेरा पागल मन !
रीते आँगन का सूनापन !

किरण