मंगलवार, 1 जून 2010

सब एकाकी

इस संसृति में सब एकाकी !
चमक रहा ऊषा के आँचल में नभ का तारा एकाकी !
इस संसृति में सब एकाकी !

ज्वार उठा सागर के उर में लहरें तट पर आ टकराईं,
निर्मम तट पर आकर उसने निज जीवन की निधि बिखराई,
सागर में अब भी हलचल है तट पर लहर मिटी एकाकी !
इस संसृति में सब एकाकी !

उषा उठा प्राची पट आई किरणों की सुन्दर सखियाँ ले,
और सांध्य बेला में खोई अपने प्राणों की पीड़ा ले,
सूर्य प्रभा ले गया सुनहरी बुझती किरण रही एकाकी !
इस संसृति में सब एकाकी !

सुमनों की चादर बहार ने आकर पृथ्वी पर फैलाई,
पर पतझड़ ने लूटा उसको सूनी पड़ी सुघर अमराई,
इस निर्जन बगिया में तितली पागल घूम रही एकाकी !
इस संसृति में सब एकाकी !

किरण