गुरुवार, 13 मई 2010

आकांक्षा

अश्रु मेरी अमर निधि हैं, तुम मधुर मुस्कान ले लो,
किन्तु प्रियतम तुम न मेरे भग्न उर के साथ खेलो !

है मुझे अभिशाप ही प्रिय आस क्यों वरदान की फिर,
क्या कभी सुखमय पलों की कल्पना रह सकी स्थिर !

अब न उतनी शक्ति मुझमें सह सकूँ अवहेलना प्रिय,
और साहस भी न इतना कह सकूँ जो वेदना प्रिय !

मैं न दीपक ही बनी जो ज्वाल प्राणों में सँजोती,
और पागल शलभ भी ना बन सकी जो प्राण खोती !

मैं कलंकी चन्द्र के संग क्षीण क्षण-क्षण हो रही हूँ,
सखे वारिद की कनी बन भार दुःख का ढो रही हूँ !

खिलें जग में फूल सुख के, चुन रही मैं शूल साथी,
व्यथित उर आँसू लुटाता, हँस रहा जग निठुर साथी !

पुष्प वे ही धन्य हैं प्रिय कंठ की जो माल होते,
स्वेद सौरभ से लिपट कर स्नेह सरि में दुःख डुबोते !

चाहती पर मैं न बनना पुष्प जो प्रिय उर लगायें,
धूलि कण ही बन सकूँ जो प्रिय चरण में लिपट जायें !

किरण