गुरुवार, 6 मई 2010

तुम न आये

आज भी प्रिय तुम न आये,
और मैं बैठी अकेली राह में पलकें बिछाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !

सप्त ऋषियों ने गगन में आज वन्दनवार बाँधे,
सोहता मंगल कलश सा धवल चन्दा मौन साधे,
जोहती हूँ बाट प्रियतम नयन में आँसू छिपाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !

खिल उठी है रातरानी गंध चरणों पर चढ़ाने,
बह उठा है पवन चंचल प्रिय परस पर वारि जाने,
गगन गंगा में किसी ने दीप तारों के बहाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !

स्वाँस वीणा पर दुखों की रागिनी प्रिय नित बजाती,
विरहिणी प्रिय आगमन हित मौन भावांजलि चढ़ाती,
झिलमिलाते दीप की मैं आरती बैठी सजाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !


किरण