शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

संसृति के भाव

संसृति के सब भाव मिटा कर
हो जीवन अभावमय आज,
विगत सुखों के स्वप्न मिटे
आगामी मृदु वैभव का साज !

भाग्य चक्र ने बना दिया जो
क्यों हो उससे क्षोभ सखे,
देख मधुर जीवन औरों का
क्यों हो उसका लोभ सखे !

खण्ड-खण्ड हो बिखर गये
यदि आशा के वे भव्य प्रसाद,
हो बिखरा नैराश्य कुटी में
जीवन का मृदुतम आल्हाद !

स्मृति सरिता इठलाती
कुटिया के प्रांगण में आये,
दिखा नवीन केलि क्रीडा
दुखिया मन को बहला जाये !

नयनों का निर्झर झर-झर कर
प्राणों में अपनत्व भरे,
निश्वासों का मलयानिल
जीवन वन में अमरत्व भरे !

विपदाओं के उमड़-घुमड़
जब घिर आयें बादल अनजान,
तड़ित वेग से चमक उठे तब
प्रिय अधरों की मृदु मुस्कान !

किरण