गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

* क्या जग का उद्धार न होगा *

ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ?

इस पतझड़ के से मौसम में

उपवन का श्रृंगार लुट गया,

लजवंती रजनी के कर से

आँचल का आधार छुट गया,

उमड़ी करुणा के मेघों से पृथ्वी का अभिसार न होगा ?

ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ?

मुरझाये फूलों का यौवन

आज धूल में तड़प रहा है,

काँटों के संग रह जीवन में

कितना उसने कष्ट सहा है,

किन्तु देवता की प्रतिमा पर चढ़ने का अधिकार न होगा ?

ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ?

उन्मादिनी हवा ने आकर

सूखे पत्तों को झकझोरा,

मर्मर कर धरिणी पर छाये

सुखद वृक्ष का आश्रय छोड़ा,

कुम्हलाई कलियों के उर में क्या जीवन का प्यार न होगा ?

ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ?

ओ माली तेरी बगिया में

आ वसंत कब मुस्कायेगा,

कब कोकिल आग्रह के स्वर में

स्वागत गीत यहाँ गायेगा,

क्या तितली भौरों के जीवन में सुख का संचार न होगा ?

ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ?


किरण