शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

देव सुन कर क्या करोगे

देव सुन कर क्या करोगे दुखी जीवन की कहानी !

यह अभावों की लपट में जल चुका जो वह नगर है,
बेकसी ने जिसे घेरा, हाय यह वह भग्न घर है !
लुट चुका विश्वास जिसका, तड़पती आशा बिचारी,
नयन के श्रृंगार मुक्ता बन चुके अब नीर खारी !
यह न आँसू की लड़ी, है ज्वलित मानव की निशानी,
दग्ध अंतर की चिता पर झुलसती तृष्णा विरानी !

देव सुन कर क्या करोगे दुखी जीवन की कहानी !

खा चुका जो ठोकरें, अगणित सही हैं लांछनाएं,
पर न कर पाया सुफल कुछ भी रही जो वांछनाएं !
बढ़ रही प्रतिपल विरोधों की लपट नित ज्वाल बन कर,
मिट रहा वह जो कभी लाया यहाँ अमरत्व चुन कर !
मनुज को छलती रही है आदि से अभिलाष मानी,
लुट रही करुणा न पिघले पर कभी पाषाण प्राणी !

देव सुन कर क्या करोगे दुखी जीवन की कहानी !


किरण