सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

* देव सुन कर क्या करोगे *

देव सुन कर क्या करोगे दुखी जीवन की कहानी !

यह अभावों की लपट में जल चुका जो वह नगर है,

बेकसी ने जिसे घेरा, हाय यह वह भग्न घर है,

लुट चुका विश्वास जिसका, तड़पती आशा बेचारी,

नयन के श्रृंगार मुक्ता बन चुके अब नीर खारी !

खा चुका जो ठोकरें, अगणित सही हैं लांछनायें,

पर न कर पाया सुफल कुछ भी रहीं जो वांछनायें,

बढ़ रही प्रतिपल विरोधों की लपट नित ज्वाल बन कर,

मिट रहा वह जो कभी लाया यहाँ अमरत्व चुन कर !

मनुज को छलती रही है आदि से अभिलाष मानी,

लुट रही करुणा न पिघले पर कभी पाषाण प्राणी,

यह न आँसू की लड़ी है ज्वलित मानव की निशानी,

देव सुन कर क्या करोगे दुखी जीवन की कहानी !

किरण