शनिवार, 6 नवंबर 2010

रहस्य

है रहस्य सारा ही जग यह
सब संसृति मतवाली है,
पार वही हो जाता इससे
जिसने पथ गति पा ली है !

जीवन है वरदान या कि
अभिशाप न जाना जाता है,
है दुर्गम इसकी गली-गली
पथ कोई खोज न पाता है !

सुख सामग्री भी बन जाती
कभी यहाँ दुःख का आगार,
कभी सिखाता दुःख जीवन को
करना अपनेपन से प्यार !

तन की ममता कभी भूलती
कभी मोह होता दुर्दांत,
घृणा कभी होती जीवन से
पीड़ा करती कभी अशांत !

आह खोज कैसे पायेंगे
इस रहस्य को पागल प्राण,
सदा जलेंगे इसी ज्वाल में
होगा कभी न इससे त्राण !

किरण