गुरुवार, 17 जून 2010

आज मुझे जी भर रोने दो

आज मुझे जी भर रोने दो !

बीते मधुर क्षणों को मुझको
विस्मृति सागर में खोने दो ,
आज मुझे जी भर रोने दो !

छुओ न उर के दुखते छाले,
मेरी साधों के हैं पाले,
बढ़ने दो प्रतिपल पर पीड़ा
उसमें स्मृतियाँ खोने दो !

आज मुझे जी भर रोने दो !

मत छीनो मेरी उर वीणा,
भर देगी प्राणों में पीड़ा,
अश्रु कणों के निर्मल मुक्ता
आह सूत्र में पो लेने दो !

आज मुझे जी भर रोने दो !

स्मृति मुझसे रूठ गयी है,
और सुषुप्ति राख हुई है,
विगत दिवस हैं स्वप्न, मुझे
स्वप्नों की रजनी में सोने दो !

आज मुझे जी भर रोने दो !

रहे अमर आँखों का पानी,
मैं , मेरी दुनिया दीवानी,
दीवानों को अपनी दुनिया
में दीवाना ही रहने दो !

आज मुझे जी भर रोने दो !


किरण