शनिवार, 26 जून 2010

स्वप्न किसके सच हुए हैं !

स्वप्न किसके सच हुए हैं !
रो न पागल क्या क्षणिक सुख से अपरिमित दुःख मुए हैं !
स्वप्न किसके सच हुए हैं !

भाव उर के बूँद बनने को मचल सहसा पड़े हैं,
नयन शाश्वत बरसने को मेघ बन करके अड़े हैं,
जल उठी है आग उर में आह के उठते धुएँ हैं !
स्वप्न किसके सच हुए हैं !

कौन अपना बन सका है एक क्षण में, एक पल में,
तृप्ति किसकी हो सकी है वारि निधि के क्षार जल में,
बँध सके क्या पींजरे में गगन के उड़ते सुए हैं !
स्वप्न किसके सच हुए हैं !

भग्न कुटिया भा सकी क्या भुला कर अट्टालिकायें,
स्नेह बिन दीपक भला क्या रह सके हैं जगमगाए,
एक नन्हीं बूँद भी क्या भर सकी सागर कुए है !
स्वप्न किसके सच हुए हैं !

सूर्य की उज्ज्वल प्रभा का क्या किसीने पार पाया,
स्मरण उर में सदा ही वेदना का भार लाया,
क्या किसीने गगन उपवन के कुसुम गुच्छे छुए हैं !
स्वप्न किसके सच हुए हैं !

किरण