रविवार, 6 जून 2010

मुझे सुहाता मुरझाना

तुम्हें फूल का खिलना भाता
मुझे सुहाता मुरझाना,
तुम्हें न भाते साश्रु नयन
मुझको न सुहाता मुस्काना !

तुम पूनम की सुघर चाँदनी
पर बलि-बलि जाते साथी,
मुझको शांत अमावस्या का
भाता यह सूना बाना !

उदित सूर्य की स्वर्ण रश्मियाँ
तुम्हें मधुर कुछ दे जातीं,
मुझे क्षितिज में डूबे रवि का
भाता वह पथ पहचाना !

तुम वसंत में कोकिल का स्वर
सुन-सुन मस्त हुआ करते,
मुझे सुहाता पावस में
पपिहे का पियु-पियु चिल्लाना !

तुम्हें सुहाती ऋतुपति के
स्वागत में व्यस्त धरिणी सज्जित,
मुझे सुहाता अम्बर का
नयनों से आँसू बरसाना !

तुम राधा मोहन के संग में
मिल कर रास रचा लेते,
मुझे सुहाते राधा के आँसू
मोहन का तज जाना !

तुम हो आदि उपासक साथी
मुझे अंत लगता प्यारा,
तुम्हें मिलन के राग सुहाते
मुझे विरह का प्रिय गाना !

आदि अंत का, विरह मिलन का
रंज खुशी का जब पूरक,
क्यों न अंत को प्यार करूँ मैं
व्यर्थ आदि पर इतराना !

किरण