शुक्रवार, 25 मार्च 2011

क्षणिकायें - ३


हृदय
की कथा नयन कह भी न पाये ,
रहे छलछलाए , व्यथा सह न पाये ,
हुई मूक वाणी विदा के क्षणों में ,
वे रुक ना सके , पैर बढ़ भी न पाये !



जा रहा इस सृष्टि से विश्वास का बल भी ,
छिन रहा इस अवनि से अब स्नेह संबल भी ,
लुट रहा है आज प्राणी सब तरह बिलकुल ,
प्रभु हुए पाषाण तो फिर छा गया छल भी !


लाज का बंधन नयन कब मानते हैं ,
स्नेह की ही साधना सच जानते हैं ,
वे सदय हों या कि निष्ठुर कौन जाने ,
ये मधुर उस मूर्ति को पहचानते हैं !



देखता है भ्रमर खिलते फूल की हँसती जवानी ,
युगल तट को सरित देती धवल रज कण की निशानी ,
प्रेम का प्रतिदान पाना अमर फल सा है असंभव ,
आश तृष्णा मात्र है , विश्वास भूले की कहानी !




किरण