बुधवार, 2 मार्च 2011

संध्या का वियोग

झिलमिल करती झीनी किरणों का मुख पर अवगुंठन डाले ,
अरुण वदन, लज्जित अधरों में भर स्मिति के मधुमय प्याले !

प्रियागमन की किये प्रतीक्षा उत्सुक नयन बिछाये पथ पर ,
आशा अरु अरमान भरे अंतर में सिहरन का कम्पन भर !

पश्चिम दिशि में खड़ी हुई प्राची मुख नव वधु संध्या बाला ,
जब बिखराये सघन केश रजनी बुनती पट झीना काला !

नील गगन की सुघर सेज को चुन-चुन तारक कुसुम सजाई ,
नभ गंगा की धवल ज्योत्सना की अनुपम चादर फैलाई !

निकल रहे थे अंतरतम से गुनगुन गीत मिलन के पल छन ,
स्वर, लय, तान मिलाने उसमें झींगुर वाद्य बजाते झन-झन !

मस्त पवन अठखेली करके रह-रह उसका पट उलटाता ,
बादल आँख मिचौली करते, सारा जग था बलि-बलि जाता !

पहर तीसरा बीत चला प्रिय चंद्र न आया, म्लान थकी वह ,
उस निष्ठुर से हुई उपेक्षित यह अवहेला सह न सकी वह !

फूट-फूट रो उठी हाय वह आँसू बरस मही पर छाये ,
नव दूर्वा, मुकुलित कुसुमों ने अधर खोल जग को दिखलाये !

नयन थके रोते-रोते, लालिमा सुघर आनन पर छाई ,
नव प्रभात का देख आगमन व्यथित हुई, निराश, अकुलाई !

भ्रात सूर्य जब डाल रश्मि पट रथ लेकर लेने को आया ,
देख बहन की अवहेला नयनों में भर क्रोधानल लाया !

चला खोजने भगिनीपति वह शांत हृदय उसका करने को ,
दुखिया के सूने जीवन में फिर से नेह नीर भरने को !

नित्य क्रोध से भरा पूर्व से चलता खोज लगाने को वह ,
हो हताश सोता पश्चिम में जाकर उसे न पाने पर वह !

आदिकाल से चली आ रही खोज न पूरी कर पाया वह ,
चंद्र सूर्य मिल सके, न फिर संध्या पर नव निखार ही छाया !

किरण