गुरुवार, 17 मार्च 2011

आई भारत में होली

आज माँ की कविताओं के संकलन से यह बेमिसाल रचना आपके लिये लेकर आई हूँ ! उनकी रचनाएं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी कितनी प्रासंगिक होती हैं यह देख कर विस्मय से भर जाती हूँ ! हर्ष और उल्लास से ओत प्रोत होली का पर्व द्वार पर दस्तक दे रहा है ! सभी रचनाकार इस पर्व पर अपनी भावनाओं, कल्पनाओं और कामनाओं को कलमबद्ध कर रहे हैं ! माँ की वर्षों पुरानी इस रचना में होली को उन्होंने कितनी अभिनव शैली में चित्रित किया है आप भी देखिये ! इसमें आपको होली के सभी रंगों का उल्लेख मिलेगा लेकिन एकदम अनोखे अंदाज़ में !

सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

नीला रंग खुशी का ओढ़े खिलती हँसती आई ,
धन वाले अधिकारी दल में शोखी मस्ती लाई ,
देखा कहीं सुरा के प्याले खनक रहे हैं खन-खन ,
कहीं भंग भोले बाबा की घुटती बँटती पाई !

रंग गुलाल अबीर छिड़कते मदमाते हमजोली,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

हरे रंग की चूनर में पीला नीला रंग भर कर ,
नये राष्ट्र की नयी नीति निकली अगणित कर लेकर ,
नयी समस्याएं आती रहती हैं सन्मुख हर दम ,
चलो जेल में मौज करो यदि तुम न चुका सकते कर !

अपने तन मन धन की भी बोलो नीलामी बोली ,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

पीला रंग खिला खेतों में किन्तु छिपा कोठों में ,
एक आह उठती अंतर से पर ताले होठों में ,
सस्ता माल खरीद कृषक से बेच रहे ये मँहगा ,
कैसा स्वार्थ समुद्र भरा इन पूंजीपति सेठों में !

एक क़र्ज़ दे चार लिखाते ठगते दुनिया भोली ,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

लाल चूनरी मिल से निकली मजदूरों की टोली ,
भेद भाव हों दूर माँगते वे फैला कर झोली ,
रहें न बिस्कुट चाय सिल्क मोटर बंगले या कोठी ,
एक समान वस्त्र भोजन हो और एक सी खोली !

इनकी यह आवाज़ दबाने छूटे डंडे गोली ,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

रंग गुलाबी ओढ़ पार्टी बाँदी बन मुस्काई ,
बीज बैर के और फूट के झोली भर कर लाई ,
एक दूसरे का अनिष्ट निज नया सोचते रहते ,
घोर अराजकता की बदली इस भारत पर है छाई !

रोज चुनाव हुआ करते हैं चलती गाली गोली ,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

काला रंग देश में कैसा बेकारी का छाया ,
कभी न तन पर कपड़ा पहना कभी न मन भर खाया ,
कोई डूब रहा पानी में, कोई फाँसी झूला ,
देखो तड़प रही धरती पर छिन्न-भिन्न इक काया !

माँ की गोद लुटा करती नित, नित पत्नी की रोली ,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

देख दुर्दशा भारत भू की लाल लाडला माँ का ,
केसरिया बाना धारण कर निकला करने साका ,
केसर की क्यारी पर उसने अपना लहू बहाया ,
पर भारत के अंग भंग को फिर भी बचा न पाया !

पर दुःख कातर आँखें मूँदीं, गयीं न फिर जो खोली ,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

श्वेत संदेशा शांति सुरक्षा का पूरब को देकर ,
शान्ति दूत कहलाये दुनिया भर में वीर जवाहर ,
गैरों ने भी बात मान ली किन्तु देश बहरा है ,
इसमें शान्ति न ला पाये हाँ बापू जी भी मर कर !

आग बुझी बाहर की लेकिन जलती घर में होली ,
सतरंगी चूनर ओढ़े आई भारत में होली !

किरण