सोमवार, 28 मार्च 2011

क्षणिकायें-- ४


बीज में ही वृक्ष का अस्तित्व है ,
दीप की लौ में दहन का तत्व है ,
लघु नहीं है कोई भी कण सृष्टि का ,
निहित शिशु में ही महा व्यक्तित्व है !


चाँदनी रोती रही है रात भर ,
आँसुओं से भर उठा सारा जहाँ ,
पर न निष्ठुर चाँद का पिघला हृदय ,
है पुरुष पाषाण में ममता कहाँ !


देवता पर फूल ही चढ़ते सदा ,
पर बेचारी धूल का अस्तित्व क्या ,
भूल जाते उस समय यह बात वे ,
धूल से ही फूल को जीवन मिला !


किरण