शुक्रवार, 11 मार्च 2011

क्षणिकायें -- २


छल
भरा नर तन स्वयम् बदनाम है,
खोजना छल छिद्र उसका काम है,
खोजती जो कालिमा रजनीश में,
आँख की पुतली स्वयम् भी श्याम है !


मृत्यु मानव के लिये अभिशाप है,
ज़िंदगी भी पाप है, परिताप है,
झूलता है मध्य में इनके मनुज ,
बना अनबूझी पहेली आप है !

3
कुछ फूलों में ही शूल हुआ करते हैं,
भावों के पंछी गगन छुआ करते हैं,
है भूल भरा जीवन बह जाने वाला,
रह जाने वाले कूल हुआ करते हैं !

किरण