बुधवार, 10 नवंबर 2010

मैं जाऊँ ढूँढने कहाँ-कहाँ ?

मैं जाऊँ ढूँढने कहाँ-कहाँ ?

रजनी की काली अलकों में,
तारों की झिलमिल ज्योती में,
तुम छिपे हुए हो जीवन धन
इस ओस के सुन्दर मोती में !

निशिपति की मृदु मुस्काहट में
आकर के तुम मुस्का जाते,
घिर करके श्याम बादलों में
तुम उनको खेल खिला जाते !

सुन्दर गुलाब की लाली में
अधरों की लाली छिपती है,
कोमल कलिका के रंगों में
हाथों की लाली छिपती है !

सूरज की ज्योती में प्रियतम
ज्योतिर्मय रूप तुम्हारा है,
अरुणोदय की अँगड़ाई में
उज्ज्वलतम रूप तुम्हारा है !

सरिता की चंचल लहरों में
वह श्याम रूप बहता पाया,
सागर के शांत कलेवर में
तव शांत रूप ठहरा पाया !

घर में, मग में, वन-उपवन में,
पृथ्वी, आकाश में, यहाँ-वहाँ,
सर्वत्र व्याप्त हो श्याम तुम्हीं
मैं जाऊँ ढूँढने कहाँ-कहाँ !

किरण