शुक्रवार, 3 जून 2011

गायक से

उद्बोधन
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किस शान्ति सुधा की आशा में ,
कविता की इस परिभाषा में ,
नैराश्य तमावृत तन और मन ,
ज्योतित करता यह उद्बोधन !

गायक से
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गायक ऐसा गा दे गान !
उमड़ उठें सातों ही सागर ,
हिल जावे यह विश्व महान् !
गायक ऐसा गा दे गान !

उठें क्रान्ति की प्रबल तरंगें
छा जावें तीनों भुवनों में ,
जगे महा आंदोलन फिर से
जगती के व्यापक प्रांगण में ,
नभ, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि में
होवे फिर संघर्ष महान् !
गायक ऐसा गा दे गान !

पर्वत पर्वत से टकराये,
नदिया से नदिया भिड़ जाये ,
मलयानिल हो जाये झंझा
सूर्य तेज से और तपाये ,
शीतल रजनी के तारों में
तड़ित वेग का हो आधान !
गायक ऐसा गा दे गान !

ऊँच-नीच का भूत भगा कर ,
हों समान सब प्रेम भाव धर ,
हो अखण्ड साम्राज्य शान्ति का ,
उमड़ें सप्त सिंधु मधु पथ पर ,
विषय वासना के महलों में
गूँजे देश प्रेम का गान !
गायक ऐसा गा दे गान !

रहें प्रेम से भाई-भाई ,
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई ,
हिन्दी, हिन्दू, हिंद देश की
फिर से जग में फिरे दुहाई ,
पहने तब प्यारी भारत माँ
निज गौरव का ताज महान् !
गायक ऐसा गा दे गान !


किरण