बुधवार, 11 मई 2011

अनासक्ति

हमको देश विदेश एक सा !

यह जीवन वह बहती सरिता, एक ठौर जो रुक न सकी है ,
यह कोमल वल्लरी स्नेह की, कभी किसीसे झुक न सकी है ,
सुख-दुःख एक समान हमें है, मिलन-विरह परिवेश एक सा !

हमको देश विदेश एक सा !

यह जीवन वह जलता दीपक, जिसने निशि दिन जलना जाना ,
सभी एक सम ज्योतित करता, भले-बुरे में भेद न माना ,
मंदिर, मस्जिद, महल झोंपड़ी का करता अभिषेक एक सा !

हमको देश विदेश एक सा !

इस जीवन उपवन में आता ग्रीष्म सभी कुछ झुलसाता सा ,
पावन करुणा की रिमझिम से दुखिया मन को सरसाता सा ,
पतझड़ की वीरानी, मधुॠतु की मस्ती का मान एक सा !

हमको देश विदेश एक सा !


किरण