शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

मेरे भाव

मेरे इस सूने जीवन में
शरद पूर्णिमा बन आये तुम ,
अमा रात्रि से अंधकार में
पूर्ण चंद्र के छाये तुम !

उजड़ चुकी थी जब पतझड़ में
इस उपवन की सब हरियाली ,
सरस सरल मधुऋतु समान
आकर इसमें हो सरसाये तुम !

जब रोती सूनी निदाध में
विकल टिटहरी तड़प-तड़प कर ,
तब वर्षा के सघन मेघ बन
उसे रिझाने हो आये तुम !

विरह व्यथित चकवी निराश हो
जब जीवन आशा बिसराती ,
प्रथम किरण सी आस ज्योति ले
धैर्य बँधाने हो आये तुम !

तुम मेरे सुख दुःख के साथी
मेरे अरमानों की प्रतिलिपि
मुझे तोष है दुःख वारिधि में
कविता नौका ले आये तुम !

किरण