शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

प्रतीक्षा

आगमन सुन प्राणधन का
भर गया उल्लास मन में मिट गया सब क्लेश तन का !
आगमन सुन प्राणधन का !

साज भूषण, वसन नूतन, भेंट हित उत्सुक हृदय ले ,
चौक सुन्दर पूर कर डाले पलक के पाँवड़े ,
दीप साजे आरती को मैं चली ले स्नेह मन का !
आगमन सुन प्राणधन का !

जगत उपवन से निराली भाव कलिका का चयन कर ,
गूँथ ली इक प्रेम माला नयन मुक्ता कण पिरो कर ,
किन्तु भारी हो गया कटना मुझे हर एक छन का !
आगमन सुन प्राणधन का !

किन्तु रजनीपति छिपे, दीपक गगन के भी बुझे सब ,
वह हार भी मुरझा गया पर प्रिय ना आ पाये अभी तक ,
ज्योति नयनों की बुझी, पिघला न निष्ठुर हृदय उनका !
आगमन सुन प्राणधन का !


किरण