बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

मैं फूलों में मुस्काती हूँ

मैं फूलों में मुस्काती हूँ,
मैं कलियों में शरमाती हूँ,
मैं लहरों के संग गाती हूँ,
मैं तारों में छिप जाती हूँ !

चंदा तारे हैं मीत मेरे,
झंझा के झोंके गीत मेरे,
रिमझिम बादल की घुँघरू ध्वनि,
होते सुभाव अभिनीत मेरे !

यह अखिल विश्व रंगस्थल है,
इसमें जितनी भी हलचल है,
सब है जीवन का मोल भाव,
सबमें ममता, सब में छल है !

किरणों के झूले पर आती,
खिलखिल कर ऊषा हँस जाती,
संध्या वियोगिनी प्रिय सुधि में,
जब अरुण क्षितिज में खो जाती !

तब मेरे राग उभरते हैं,
तब मेरे प्राण उमड़ते हैं,
तब मेरे नयनों में करुणा
के घन चौकड़ियाँ भरते हैं !

क्यों ? नहीं जान मैं सकी कभी,
पर मन की गति ना रुकी कभी,
है एक यही कवि की थाती,
जो नहीं विश्व में बिकी कभी !

मैं हूँ सबमें, सब मुझमें हैं,
है यही चिरंतन शिवम् सत्य,
मैं भूतकाल, मैं वर्तमान ,
मैं ही आने वाला अगत्य !


किरण