गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

चल मन अपनी प्यास बुझाने !

चल मन अपनी प्यास बुझाने !
मानस सर के निर्मल जल में, निज जीवन के स्रोत मिलाने !
चल मन अपनी प्यास बुझाने !

मत बन चंचल तज जग वैभव,
मत इस सुख पर दीवाना बन,
क्षणभंगुर है यह जग, यह सुख,
क्षणभंगुर है जग का वैभव,
माया मृग से चंचल सपने, ले चल उसमें आज डुबाने !

चल मन अपनी प्यास बुझाने !

संकीर्ण पंथ है लक्ष्य दूर,
पग-पग पर कंटक जाल बिछे,
छू मत इन चंचल वृक्षों को,
अभिसिक्त मोह रूपी जल से,
चल मन इस पापी जीवन के, दागों को धो आज मिटाने !

चल मन अपनी प्यास बुझाने !

है प्यास प्यास कुछ और नहीं,
होतीं न तृप्त अभिलाषायें,
आशा के दीपक क्षीण पड़े,
छाईं घनघोर निराशायें,
अब यहाँ कौन आएगा रे मन, तुझको भूली राह बताने !

चल मन अपनी प्यास बुझाने !

वे पथ दर्शक तो चले गये,
उनकी कृतियों का आश्रय ले,
माया तृष्णा को त्याग अरे,
रीते घर में यह निधि भर ले,
यह मिथ्या जग इसका वैभव, ले चल दुःख पर आज लुटाने !

चल मन अपनी प्यास बुझाने !


किरण