रविवार, 26 दिसंबर 2010

विफल आशा

आई थी मैं बड़े प्रात ही
लेकर पूजा की थाली,
फैला रहे क्षितिज पर दिनकर
अपनी किरणों की जाली !

उषा अरुण सेंदुर से अपने
मस्तक का श्रृंगार किये,
चली आ रही धीरे-धीरे
प्रिय पूजा का थाल लिये !

मैं भी चली पूजने अपने
प्रियतम को मंदिर की ओर,
आशा अरु उत्साह भरी थी
नाच रहा था मम मन मोर !

पहुँची प्रियतम के द्वारे पर
किन्तु हाय यह क्या देखा,
मंदिर के पट बंद हाय री
मेरी किस्मत की लेखा !

उषा मुस्कुराती थी लख कर
मेरी असफलता भारी,
लज्जा से मैं गढ़ी हुई थी
कुचल गयी आशा सारी !

किरण