मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

नया संसार

एक नया संसार बना कर
जग से दूर क्षितिज तट में,
वहाँ छिपाऊँगी अपने को
अवनी के धूमिल पट में !

दुखियों का साम्राज्य नया
निष्कंटक मैं बनवाऊँगी,
दु:ख राज्य की रानी बन मैं
सुन्दर राज्य चलाऊँगी !

पीड़ा मेरी मंत्री होगी
आहों का मैं बना विधान,
सदा करूँगी खण्डित उससे
सुख का औ आशा का मान !

केवल एक निराशा का
होगा मेरे हाथों में दण्ड,
अरमानों को तोड़-फोड़ कर
मैं कर डालूँगी दो खण्ड !

एक फेंक दूँगी जगती पर
उसका न्याय बताने को,
एक विधाता के चरणों में
अपनी विनय सुनाने को !

और कहूँगी जगत पिता से
"प्रभु दिखलाना तनिक दया,
अमर रहे दुखियों का जीवन
अमर रहे साम्राज्य नया !"

किरण