मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

ॠतु वर्णन - ग्रीष्म

आज प्रस्तुत है ऋतु वर्णन का तीसरा भाग 'ग्रीष्म' जब धरिणी
नायिका को अपने प्रियतम के कोप का ताप सहने के लिये
विवश होना पड़ा !
ग्रीष्म

रहा वह ठगा सा निरख कर स्वगृहणी
पगी अन्य के संग रंगराग में थी ,
चढ़ाये नये द्राक्ष की मस्त हाला
नशे में भरी व्यस्त वह फाग में थी !

धधक कर उठी क्रोध की ज्वाल उर में
जली होलिका सी, हुआ रंग काला ,
हुआ रौद्र सा वेश उसका भयंकर
मही का तभी नोच सब साज डाला !

हरी चूनरी घास की चीर डाली ,
गिरे सूख कर पुष्प के आभरण सब,
मिटा रूप अनुपम, बिलखती रही वह,
गयी सूख बिलकुल छुटा प्रिय रमण जब !

ज्वलित सूर्य किरणों का कोड़ा उठा कर
अनेकों धरा पर लगाये तड़प कर ,
फटे अंग उसके, पड़ी तब दरारें
धरा रह गयी तिलमिला कर, सिसक कर !

गये सूख नद, ताल, छाई उदासी
दशा दीन उसकी किसी को न भाई ,
सुनो वह सुनाऊँ कहानी निराली
सुनी, ना अभी तक किसीने सुनाई !

किरण