शनिवार, 18 सितंबर 2010

* पंछी अकेला *

ह्रदय में कुछ साध लेकर उड़ चला पंछी अकेला !

नील नभ के सुघर उपवन ओर बढ़ता जा रहा था,
केतकी के कुञ्ज सा उड्पुन्ज मन को भा रहा था,
खोजती थीं चपल आँखें शांत, निर्जन, शून्य कोटर,
रच सके वह रह जहाँ निज कल्पना का नीड़ सुन्दर,

रवि किरण मुरझा रही थी, आ रही थी सांध्य बेला !
ह्रदय में कुछ साध लेकर उड़ चला पंछी अकेला !

थक चुके थे पंख उसके छा रही मन पर उदासी,
क्रूर जग की निठुरता से हो दुखी, जीवन निरासी,
अलस उर में शून्य का साम्राज्य अविचल छा रहा था,
उस प्रताड़ित आत्मा पर शोक तम गहरा रहा था,

सोचता वह बैठ जाऊँ एक क्षण को पंख फैला !
ह्रदय में कुछ साध लेकर उड़ चला पंछी अकेला !

तृण चुनूँ कोमल उदित रवि किरण के सुन्दर सुहाने,
श्वेत बादल से चुनूँ कुछ रूई के टुकड़े लुभाने,
चाँदनी की चुरा कतरन सुघर तारक कुसुम चुन लूँ,
और अपनी प्रियतमा संग नीड़ नव निर्माण कर लूँ,

हो सुखद संसार मेरा, हो मधुर प्रात: सुनहला !
ह्रदय में कुछ साध लेकर उड़ चला पंछी अकेला !

देखता हूँ इधर कुछ फैले हुए से नाज के कण,
झिलमिलाते गेहूँओं की कांति से है सुघर हर कण,
ला चुगाऊँ नवल कोमल बालकों को चैन पाऊँ,
शान्ति का संसार रच लूँ प्रेम का जीवन बिताऊँ,

निर्दयी झंझा न होगी और बधिकों का न मेला !
ह्रदय में कुछ साध लेकर उड़ चला पंछी अकेला !

इस जगत में स्वार्थ से हैं भरे सब ये आज प्राणी,
दूसरों की शान्ति सुख का हरण करते हैं गुमानी,
मारते ठोकर, सहारा बेबसों को भी न देते,
चोंच में आया हुआ चुग्गा झपट कर छीन लेते,

दीखता जब यह सुघर उपवन न क्यों छोड़ूँ झमेला !
ह्रदय में कुछ साध लेकर उड़ चला पंछी अकेला !

किरण