गुरुवार, 9 सितंबर 2010

* साकार बनो ओ निराकार *

साकार बनो ओ निराकार !

कर प्राण देह से अलग
भला क्या मानव मानव रह सकता,
पूजा के बिना पुजारिन का
अस्तित्व न कोई रह सकता !

अंतर की भाव तरंगों का
होता है मुख पर आवर्तन,
मानस का हर्ष शोक आकर
करता नयनों में परिवर्तन !

अनुभव के बिना न हो सकती
अभिव्यक्ति कभी भी जीवन में,
क्या बिना सत्य आधार लिए
कल्पना कभी जगती मन में !

बतला असीम बिन सीमा के
कैसे तेरा अस्तित्व रहे ,
मृत हो न जगत में आज अरे
तो कैसे फिर अमरत्व रहे !

जल बिना जलाशय का जीवन
जगती में किसने है देखा,
वह चित्र बनेगा कैसे फिर
जिसमें न बने पहले रेखा !

सृष्टा और संसृति में रखना,
है भेदभाव फिर निराधार,
तेरी साकार मूर्ति ही है
मेरी पूजा, मेरा श्रृंगार !

साकार बनो ओ निराकार !


किरण