गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

दर्पण

आज से माँ की दूसरी पुस्तक 'सतरंगिनी' की रचनाएं इस ब्लॉग पर अपने पाठकों के लिये उपलब्ध करा रही हूँ ! इन रचनाओं का कथ्य, इनकी अभिव्यक्ति और इनका कलेवर आपको पहले की रचनाओं से भिन्न मिलेगा और आशा करती हूँ ये रचनाएं भी आपको अवश्य पसंद आयेंगी !


आज अभावों की ज्वाला में
झुलसा हर इंसान रो दिया ,
अन्वेषण से थक नयनों ने
भू में करुणा पुन्ज बो दिया ,
कुछ ऐसे मौसम में साथी
यह खेती लहलहा उठी है ,
जग ने निर्ममता अपना ली
मानवता ने प्यार खो दिया !


किरण