शनिवार, 23 अप्रैल 2011

एक अकेली सौदाई है

जनजीवन ही सस्ता है बस केवल इस संसार में ,
एक अकेली सौदाई है मौत भरे बाज़ार में !

निकल पड़ी है चौराहों पर नंगे भूखों की टोली ,
धू-धू कर जल रही हाट में अरे अभावों की होली ,
घूम रहे सब दिशाहीन से पाने को दो कौर अनाज ,
सरे आम नीलाम हो रही है घर की गृहणी की लाज !

दूध दही की नदियाँ बदलीं विवश अश्रु की धार में ,
एक अकेली सौदाई है मौत भरे बाज़ार में !

गेहूं, जौ, मक्का, चावल के खेत लुटे, रो रहा किसान ,
हर घर में घुस गये लुटेरे, लूट ले गये सब सामान ,
रक्षक ही भक्षक बन बैठे, कुचल रहे हैं जनजीवन ,
कौन सुने फ़रियाद कि कितने घायल हैं हर तन और मन !

घर में चूहे दण्ड पलते, सन्नाटा हर द्वार में ,
एक अकेली सौदाई है मौत भरे बाज़ार में !

जनता के प्रतिनिधि से माँगी पागल प्राणों ने रोटी ,
लाठी, गोली, अश्रु गैस से बिखर गयी बोटी-बोटी ,
खुल कर खेल रही दानवता, सिसक उठी है मानवता ,
सड़कों, गलियों, चौराहों पर कुचली जाती है ममता !

सत्ता के मद में हैं अंधे बैठे जो सरकार में ,
एक अकेली सौदाई है मौत भरे बाज़ार में !

जब-जब माँगा रक्त चंडिका ने आई जनता भोली ,
उस प्यासी खप्पर वाली को दिया रक्त, भर दी झोली ,
फिर भी उसकी प्यास अमिट ही रही, निराली धुन पाई ,
घर के दीपक बलिवेदी पर भेंट चढ़ा कर इतराई !

अजब शान्ति और तृप्ति मिल रही उसको इस अधिकार में ,
एक अकेली सौदाई है मौत भरे बाज़ार में !


किरण