रविवार, 10 अप्रैल 2011

भारत माता

ओ अगाध ममता की देवी ओ मेरी भारत माता ,
अन्यायों से नहीं झुकेंगे तेरे वीर कष्ट त्राता !

तेरी भव्य मूर्ति अंकित है जनमानस में अविचल शांत ,
रूप अलौकिक, अभिनव, ज्योतिर्मय मुखमंडल किंचित् श्रांत !

शुभ्र केश राशि पर सज्जित हिम किरीट स्वर्णाभ सुघर ,
है ललाट पर अंकित कुंकुम चर्चित अमरनाथ मंदिर !

गिरी कज्जल की ललित रेख से सज्जित कजरारे नैना ,
काश्मीर की केसर क्यारी से सुरभित मधुरिम बैना !

पञ्च महानद के आभामय मुक्ता तव गलहार बने ,
गुर्जर, बंग वीर रत्नों से गर्वित तव भुजपाश तने !

हरित शालिवन से तेरे धानी आँचल में रत्न जड़े ,
विन्ध्य, सतपुड़ा, नीलगिरी के कटिबंधों से पुष्प झड़े !

महाराष्ट्र, मद्रास, युगल चरणों में गोदावरि नूपुर ,
कृष्णा , कावेरी की पायल में रुनझुन का मधुरिम स्वर !

महादेवी तव युगल चरण को महा सिंधु नित धोता है ,
तेरे इस वैभव पर माता अरि दल सर धुन रोता है !

तेरी रक्षा में बलिवेदी पर चढ़ चले वीर अगणित ,
त्यागी, प्रेमी, धीर, वीर, व्रतधारी, सक्षम, शांत, सुचित !

तेरे इस अक्षय वैभव को चोर चुराने नित आते ,
देख पहरुए सजग, कर्मरत दुखी निराश लौट जाते !

मेरे मन की यह अभिलाषा माँ कैसे मैं बतलाऊँ ,
पूजा की विधि नहीं जानती कैसे मंदिर तक आऊँ !

है इतनी ही साध हृदय की कुछ तेरी पूजा कर लूँ ,
तेरी इस अपरूप माधुरी को अपने उर में भर लूँ !

एक कामना है यह मेरी किसी बेल का फूल बनूँ ,
बलिदानी वीरों की पदरज में अपना नव नीड़ चुनूँ !


किरण