गुरुवार, 15 जुलाई 2010

खो चुकी हूँ !

खो चुकी हूँ आज अपने आपका अपनत्व री सखि !

आज प्राणों में कसक है, ह्रदय में पीड़ा घनेरी,
नयन वारिद उमड़ आये, भर निराशा की अँधेरी,
धुल चुके अरमान सारे जल चुका है ममत्व री सखि !

खो चुकी हूँ आज अपने आपका अपनत्व री सखि !

आज सरिता की लहर सा रह गया है गान मेरा,
क्षितिज तट की क्षीण रेखा सा रहा अभिमान मेरा,
कब बनी हूँ, कब मिटूँगी, क्या रहा मम सत्व री सखि !

खो चुकी हूँ आज अपने आपका अपनत्व री सखि !

बाल रवि की कान्त किरणों सा हुआ उत्थान मेरा,
अस्त रवि की क्षीण रेखा सा रहा अवसान मेरा,
आज बन कर मिट चुकी मैं, लुट चुका अस्तित्व री सखि !

खो चुकी हूँ आज अपने आप का अपनत्व री सखि !

किरण