शनिवार, 3 दिसंबर 2011

उस पार


नभ गंगा की चारु चमक में
देख सखी एकांत विचार ,
पीत वसन, धर अधर मुरलिका
रख कर गौ पर कर का भार !

बने त्रिभंगी सुना रहे कुछ
अर्जुन को अर्जुन के गीत ,
तभी उठ रहा तारक द्युति से
मधुर-मधुर मधुमय संगीत !

यह जगमग आधीन पार्थ है
प्राणी तो बस साधन है ,
भ्रम है, व्यर्थ मोह है जग में
क्षण स्थाई जीवन है !

इसी भाँति संसृति के क्रम में
जीवन धन हैं बता रहे ,
भूले पथ पर चलने वालों को
सुराह हैं बता रहे !

हम भी भूले हैं पथ सजनी
भूले प्रियतम करुणागार ,
चलो ढूँढने चलें , "कहाँ ?"
"इस नभ गंगा के भी उस पार !"


किरण