शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

दीवानी दुनिया के पार




दूर क्षितिज के धूमिल तट पर देखो तो सजनी उस पार ,
देख रहा है अरे चमकता शुचि सुन्दर सा किसका द्वार !

अरी कौन आता पागल सा बता रहा जो सुन्दर रीत ,
उस अभिनव मंदिर से किसकी स्तुति में गाता सा गीत !

ठहरो! सुनो, कह रहा वह क्या "हैं! यह है कैसा संगीत !
अरी रहा सारी संसृति को अपनी स्वर लहरी से जीत "!

दीवानी दुनिया के प्राणी सुनो सुनो कुछ देकर ध्यान ,
व्यर्थ भटकते क्यों माया में गाओ प्रियतम का गुणगान !

आओ चलो प्रेम मंदिर तक, प्रेम देव के चरणों तक ,
सेवा, स्नेह, हृदय, यह जीवन बलि कर दो स्वर्णिम सुख तक !

सजनि ! पथिक के राग सुनो कैसा सुन्दर उपदेश अरे !
करने प्रेम देव की पूजा जग से यदि हो जायें परे !

तो सजनी चल के ढूँढें अब पावन उस प्रियतम का द्वार ,
चलो चलें उस ओर वहीं, इस दीवानी दुनिया के पार !



किरण