रविवार, 20 नवंबर 2011

सूने में प्रतिमा बोल पड़ी


सूने में प्रतिमा बोल पड़ी !

भोर हुआ पंछी वन बोले , किरणों ने घूँघट पट खोले ,
सूर्य कलश ले पूजन हित मंदिर में ऊषा दौड़ पड़ी !
सूने में प्रतिमा बोल पड़ी !

भक्त पुजारी सेवक आये, भेंट भोग बहुतेरा लाये ,
अरमानों को पूर्ण बनाने विनय सुनाई प्रेम भरी !
सूने में प्रतिमा बोल पड़ी !

इक दुखिया भी मंदिर आई , स्नेह सिंधु के मुक्ता लाई ,
नयन नीर , सूने कर दोनों , चढ़ी न सीढ़ी बड़ी-बड़ी !
सूने में प्रतिमा बोल पड़ी !

सब लौटे छाया सूनापन , चल पड़ी लौट वह भी उन्मन ,
"पगली अपनी स्नेह भेंट ला , ऐसे ही क्यों लौट पड़ी !"
सूने में प्रतिमा बोल पड़ी !

"साज बाज का काम नहीं कुछ , प्रेम प्रीति का दाम नहीं कुछ ,
तेरे भाव कुसुम की कीमत सबसे ऊँची और बड़ी !"
सूने में प्रतिमा बोल पड़ी !


किरण