सोमवार, 12 सितंबर 2011

आये बिन बनेगी ना

हिन्दी भाषा के उत्थान के लिये मेरी माँ उस युग में भी कितनी व्यग्र थीं ज़रा उसकी बानगी देखिये उनकी इस रचना में !


बिन सूत्रधार हुए आपके हे यदुनाथ
हिन्दू जाति उच्चता को प्राप्त अब करेगी ना ,

सो रही जो वर्षों से अज्ञानता की नींद में
बिन चौकीदार के जगाये वह जगेगी ना ,

भूल चुकी संस्कृत, बिसार चुकी हिन्दी जो
बिन सिखलाये 'कैट' 'रैट' ज़िद से हटेगी ना ,

इसलिये पुकार कर ये कहती 'ज्ञान' बार-बार
नाथ अब भारत में आये बिन बनेगी ना !


किरण